तुम दो स्पंदन मेरी कलम को शब्दों को दो प्राण प्रेम की मंद मघुर लय दो
कर पाऊं कुछ मेरी रचना जीवन हो साकार ज्ञान का ऐसा एक वर दो
तुम दो स्पंदन मेरी कलम को शब्दों को दो प्राण प्रेम की मंद मधुर लय दो
कुसुम सुमन से जो कुछ पाया कंटको ने छिना सारा
रचना व्यर्थ ना जाय तिहारी जन्म सफल कर दो
तुम दो स्पंदन मेरी कलम को शब्दों को दो प्राण प्रेम की मंद मधुर लय दो
मैं तो रहना चाहूँ ऐसे मुक्त रहे जल धारा जैसे
दिख जाय प्रतिबिम्ब स्वयं का निर्मल मन कर दो
तुम दो स्पंदन मेरी कलम को शब्दों को दो प्राण प्रेम की मंद मघुर लय दो
घोर निराशाओ ने घेरी मेरी मंजुल अभिलाषाएं
आशाओं के नभ में मुझ को दिनकर तुम कर दो
तुम दो स्पंदन मेरी कलम को शब्दों को दो प्राण प्रेम की मंद मघुर लय दो
कर पाऊं कुछ ऐसी रचना जीवन हो साकार ज्ञान का ऐसा एक वर दो
तुम दो ..
Tuesday, April 1, 2008
मैं और तू
मैं तो हूँ जैसे कांसे की हांडी मैं रखा सदा पानी
और तू रे छोरी पुडिया है रंग की
कभी ऐसी तो कर रे नादानी
के घुल जा इस सादे पानी मैं ऐसे
के सब को खू लगे ये पानी
देख ऐसा ना हुआ तो
तू ना रंग पाईमुझे तो
कोई और रंग लेगा मुझे अपने ही रंग में
रोएगी उस वक्क्त बैठी
कहेगी मैं फरेबी था
था मैं बैरी था
मैं तो हूँ जैसे कांसे की हांडी मैं रखा सदा पानी
और तू रे छोरी पुडिया है रंग की
कभी ऐसी तो कर रे नादानी
के घुल जा इस सादे पानी मैं ऐसे
के सब को खू लगे ये पानी
देख ऐसा ना हुआ तो
तू ना रंग पाईमुझे तो
कोई और रंग लेगा मुझे अपने ही रंग में
रोएगी उस वक्क्त बैठी
कहेगी मैं फरेबी था
था मैं बैरी था
मैं तो हूँ जैसे कांसे की हांडी मैं रखा सदा पानी
Monday, March 31, 2008
Thursday, January 31, 2008
खिड़की मेरी
खिड़की मेरी जिस आकाश में खुलती है
चाँद नही आता उस रस्ते
दूजे किसी आकाश से होकर
राह चाँद को मिलाती है
खिड़की मेरी जिस आकाश में खुलती है
चाँद से भी हो क्या शिकायत
चांद से भी हो क्या गिला
अंतहीन आकाश है
और अनगिनत है खिड़कीया
उस पर बेचारा
सबका प्यारा
एक अकेला चाँद
कहाँ -कहाँ जाएगा ?
हर खिड़की से होकर गुजरे
ऐसा कैसे हो पायेगा?
ख्वाहिश तो अब ख्वाहिश ही ठहरी
हर खिड़की की होती है
खिड़की जब भी, जिस आकाश पे खुलती है
उस पर जब काली स्याही, धीरे-धीरे घुलती है
हर खिड़की तब बाहें फैलाये ,चाँद की राहें तकती है
अपनी भी एक खिड़की मुई
सूने आकाश में खुलती है
चाँद नही आता उस रस्ते
बुझती-बुझती आंखो में भी
चाँद की आमद रहती है
खिड़की मेरी जिस आकाश में खुलती है
खिड़की मेरी जिस आकाश में खुलती है
चाँद नही आता उस रस्ते
दूजे किसी आकाश से हो कर राह चाँद को मिलाती है
चाँद नही आता उस रस्ते
दूजे किसी आकाश से होकर
राह चाँद को मिलाती है
खिड़की मेरी जिस आकाश में खुलती है
चाँद से भी हो क्या शिकायत
चांद से भी हो क्या गिला
अंतहीन आकाश है
और अनगिनत है खिड़कीया
उस पर बेचारा
सबका प्यारा
एक अकेला चाँद
कहाँ -कहाँ जाएगा ?
हर खिड़की से होकर गुजरे
ऐसा कैसे हो पायेगा?
ख्वाहिश तो अब ख्वाहिश ही ठहरी
हर खिड़की की होती है
खिड़की जब भी, जिस आकाश पे खुलती है
उस पर जब काली स्याही, धीरे-धीरे घुलती है
हर खिड़की तब बाहें फैलाये ,चाँद की राहें तकती है
अपनी भी एक खिड़की मुई
सूने आकाश में खुलती है
चाँद नही आता उस रस्ते
बुझती-बुझती आंखो में भी
चाँद की आमद रहती है
खिड़की मेरी जिस आकाश में खुलती है
खिड़की मेरी जिस आकाश में खुलती है
चाँद नही आता उस रस्ते
दूजे किसी आकाश से हो कर राह चाँद को मिलाती है
Wednesday, January 23, 2008
सयाना
छुटपन में
जिस मेले से चुराई थी बांसुरी, गुब्बारे
और खिलोने बहुत से
आज उसी मेले से
जी चुराता हूँ
जाने क्यों इतना सयाना हो गया हूँ
जिस मेले से चुराई थी बांसुरी, गुब्बारे
और खिलोने बहुत से
आज उसी मेले से
जी चुराता हूँ
जाने क्यों इतना सयाना हो गया हूँ
कैलेंडर
तारीख़ बदलती
फटता कैलेंडर
दिन,महीना,साल चढ़ आता
फिर एक रोज़
खूंटी में टंक जाता एक नया कैलेंडर
ज़िंदगी बदलती सिर्फ कैलेंडरों में यहाँ
ऐसे क्यों नही बदलती
जैसे मैं बदलना चाहता हूँ
जैसे तुम बदलना चाहती हो
फिर मैं महज़ कैलेंडर बदलने को बेसब्र
उस दिन का इंतज़ार नही करता
जिसे कहती हो तुम.... नया साल !
फटता कैलेंडर
दिन,महीना,साल चढ़ आता
फिर एक रोज़
खूंटी में टंक जाता एक नया कैलेंडर
ज़िंदगी बदलती सिर्फ कैलेंडरों में यहाँ
ऐसे क्यों नही बदलती
जैसे मैं बदलना चाहता हूँ
जैसे तुम बदलना चाहती हो
फिर मैं महज़ कैलेंडर बदलने को बेसब्र
उस दिन का इंतज़ार नही करता
जिसे कहती हो तुम.... नया साल !
Subscribe to:
Posts (Atom)