Friday, April 16, 2010

और क्या है अपने वजूद का हासिल

अपने होने की वजह ।

बस मौत की खुराक हैं हम और तुम।


कलेंडर में लिखी वो तारीखें जो महज़ बदला करती हैं

जिन के बदलने से दिन नहीं बदला करते

वो तारीखें हैं हम और तुम

जो कभी तवारीख नही बनती ।

किसी अफ़साने में लिखे वो हर्फ़ जो पढ़े तो जाते हैं

मगर समझे नही जाते

जिनके मानी कुछ बन नही पाते

मानी के इर्द-गिर्द बेमानी से पड़े रहते हैं ।

अफसाना नही कहते अफ़साने की ख़ामोशी जीते हैं

वो हर्फ़ हैं हम और तुम

और क्या है अपने वजूद का हासिल

अपने होने की वजह।

बस मौत की खुराक हैं हम और .........

1 comment:

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

ye nazm suni thi tumse mukul.....han tumhe padhne ka maza alag hai ..aur tumhe sunne ka alag ....... :) behtareen hai rachana

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