Saturday 25 June 2011

पुनर्जन्म


 
बहुत पहले मर चुका था मैं
पर ख़बर इस बात की मुझे ज़रा देर से मिली
मरे हुए आदर्शों और सड़ी-गली ईमानदारी की बू ने 
जब मेरी रूह का जीना हराम  कर डाला
पता लगा ये सडन  जो मेरी साँसों में बस गई है
घर के कबाड़खाने में मरे चूहे की नहीं
ड्राइंगरूम में मरे इंसान की है.

Tuesday 30 November 2010

हदों के पार तक फैला यहाँ बाज़ार हैं 
वाह ! इस दौर-ऐ-दिल्ली में अर्थियां भी रेडी मेड मिलती हैं
कफ़न के पीस कटे हुए, फ्री साइज़ सबके लिए
चन्दन, लकड़ी, घी अगरबत्ती, आम की फट्टी
फूल, माला, घाट तक पहुँचाने वाला
कभी भी मरो वक्क्त, बेवक्क्त 
यहाँ हर समय तैयार मिलते हैं
भाई सुविधा है मरने की! 
बस एक कॉल और फ्री होम डिलवरी.
...................विज्ञापन के इस दौर में
बिकने और बेचे जाने की इस होड़ में
वो दिन भी बस आता होगा
जब हमें बनाने होंगे
अर्थियों के ऑफर एड
एक के साथ एक फ्री
कॉम्बो पैक
फैमली पैक
सोचता हूँ क्या यहीं के लिए निकला था ?
जब घर का ऑगन छूटा था

ऐसा नहीं के मेरे गाँव में लोग नहीं मरते 
पर वहां अर्थियों के बाज़ार नहीं लगते.


हदों के पार तक फैला यहाँ बाज़ार हैं....

Wednesday 10 November 2010

मंगलवार  को अंडे नहीं खाते हम
हाँ मगर बुद्ध को आदमी का खून पीते  हैं.

गालियाँ देना? हुनर ये तहज़ीब ने हमें गवारा ना किया.
हम तो वो हैं जो निगाहों से कपढ़े उतार देते हैं.

सब माँ-बहने हैं मेरी, मेरी बीबी को छोड़ के,
फिर भी आदत कि जेब में हर वक़्त कॉन्डोम रखते हैं


मंगलवार को अंडे नहीं खाते हम

हाँ मगर बुद्ध को आदमी का खून पीते हैं.

Thursday 29 April 2010

मेरी नायिका


शरतचन्द्र की कहानियों के गाँव में
अशोक के पेड़ों की लम्बी कतारों के बीचों-बीच

सूनसान पगडंडियों पर गुजरती ......

या गर्म दोपहर में आम के बागीचे से लौटती
लाल किनारे वाली सूती धोती पहने
सांवले चेहरे पर उजली धूप लिए
कभी मिली थी तुम  एक सह्फ़े पर

देखा था तुमको मूसलाधार बारिश की किसी शाम
अमरूद के बाड़े की ओर खुलते वरांडे पर

बारिश के साथ रविन्द्रनाथ के प्रेम गीतों में भीगते हुए
किसी नॉवेल में .

पर
बाद उसके ढूँढा तुम को ज़िन्दगी में

स्कूल, कॉलेज
बाज़ार, हाट

गली, मोहल्ले
राहों-चौराहों
पोखर-धारे

गाँव-शहर-महानगर, द्वारे-द्वारे
पर तुम कहीं नहीं थी.


मेले-ठेले
नाटक, नौटंकी
रामलीलाओं,जगराते
बाजे-घाजे
महफ़िल, सन्नाटे
सब जगह तुम्हारी टोह ली
पर तुम कही नहीं थी....

हिन्दू, मुस्लिम
सिख, इसाई जैन, पादरी
ब्रह्मण, क्षत्रिय
वैश्य, शु ...
गोरे , काले
सारी जातों, नसलों सब जगह तुम्हें खोजा,खंगाला
तुम्हारी सम्भावना को स्वीकारा.

पर तुम कहीं भी नहीं थी
मेरी नायिका !

शरदचन्द्र को भी तुम बस
उनकी कहानियों में ही मिली हो शायद

मेरी नायिका !



सहफ़े : पन्ना

Friday 16 April 2010

और क्या है अपने वजूद का हासिल

अपने होने की वजह ।

बस मौत की खुराक हैं हम और तुम।


कलेंडर में लिखी वो तारीखें जो महज़ बदला करती हैं

जिन के बदलने से दिन नहीं बदला करते

वो तारीखें हैं हम और तुम

जो कभी तवारीख नही बनती ।

किसी अफ़साने में लिखे वो हर्फ़ जो पढ़े तो जाते हैं

मगर समझे नही जाते

जिनके मानी कुछ बन नही पाते

मानी के इर्द-गिर्द बेमानी से पड़े रहते हैं ।

अफसाना नही कहते अफ़साने की ख़ामोशी जीते हैं

वो हर्फ़ हैं हम और तुम

और क्या है अपने वजूद का हासिल

अपने होने की वजह।

बस मौत की खुराक हैं हम और .........

Monday 27 July 2009

चुप सी रहती हो!

तुम कैसी खीज उतारती हो
बेगुनाह गैस के चूल्हे पर
जब सब्जी जल जाती है तुम्हारी
और तुम्हें कितना गुस्सा आता है
जब आटा वो गीला हो जाता है तुम्हारा
तेज़ हवा जब छू कर निकलती है तुम्हें
तुम्हारा दुपट्टा सरका जाती है
कमीज़ तुम्हारी हवाओं में लहरा जाती है
तुम उस पर भी कुछ बुदबुदाती हो मुंह ही मुंह में
पर तुम कितनी चुप सी रहती हो
कुछ भी नहीं कहती हो उनको
जो पूछते है तुमसे
घर से बस बहार ही निकलने पर
कहाँ जाती हो?
क्यूँ?
किसलिए?
तुम उन से तो कभी कुछ नहीं कहती हो!
उन मान्यताओं, परम्पराओं,धर्म और समाज को
जिन्होंने तुम्हें
तुम्हारे ड्राइंग रूम का शो-पीस भर बना कर रख दिया है
जिन्होंने तुम्हें तुम्हारी रसोई का बर्तन
चारपाई पर पड़ा बिस्तर
और किसी खूंटी पर टंके तौलिये के माफ़िक
सुविधाजनक बना दिया है
तुम उन से तो कभी कुछ नहीं कहती हो !
तुम उनसे कभी कुछ क्यूँ नहीं कहती हो?
नल से कहती हो, पानी से कहती हो
झाड़ू से कहती हो, कूड़े से कहती
सुई-धागे, कील-हथौड़े से कहती हो
परदे, चादर, गद्दे, लिहाफ़
सर्फ़, साबुन, दाग
सबसे झगड़ती हो
राशन, नून, तेल, चाय, शक्कर
जीरा, अजवाइन, आटे-दाल
सब पे बिगड़ती हो
और कभी-कभी तो मैंने तुम्हें
जली हुई रोटी को
हाँ रोटी को!
ओह शिट! कहते हुए भी सुना है
कहो ना मैंने सच ना कहा है ?
गैस सिलेंडर ने खाई है सुबह-सुबह गलियाँ तुम्हारी
वक़्त से पहले जब गैस ''हवा'' हुआ है
कभी साड़ी पे, कभी सेंडिल पे सवार रहती हो
कभी पायल, कभी झुमके से नाराज़ रहती हो
बालों पे झुंझलाती हो कंघे को आँख दिखाती हो
घर, दीवार, खिड़की, रौशनदान
सूरज, बादल, हवा, पानी
गीत, गजल, नज़्म, कहानी
सबने सुनी हैं झिडकें तुम्हारी
पर जहाँ बोलना होता है तुम्हें इतना भर
कि उन्हें सुनाई दे सके
तुम कितनी चुप सी रहती हो!
तुम उनसे कभी कुछ क्यूँ नहीं कहती हो?

Thursday 25 June 2009

ज़िन्दगी


प्याले में ठहरी चाय में
अपने ही अक्श को घूरना
घूँट -घूँट पीना तन्हाई.
घूँट -घूँट कुंठाओ का थूक निगलना.
सिगरेट को होंठ जलने तक चूसना.
कहाँ हो तुम ?
दीवार में चिपके रोबदार स्वामी विवेकानंद
जहाँ भी जाता हूँ मुझे ही देखते है.
मैं आखें झुका लेता हूँ.
अपने भीतर ताकत नहीं पाता.
कहाँ हो तुम ?
चिपचिपी गर्म दोपहर में
गंजी पहन के अपने कमरे में छटपटा रहा हूँ
इधर-से उधर.
दीवार पर टंका सीसा
देखा हुआ सा लगता है कुछ.
खुद से जाने क्या-क्या बड़बड़ाता हूँ.
समझता मैं तो वो भी समझ ही जाता
सीसे के उस ओर वाला आदमी भी
अब सन्दर्भहीन मेरी बातें
नहीं सुनता.
ट्रांजिस्टर पर पुराने फ़िल्मी गीत बज रहे हैं
चाहते है कोई सुने उनको .
कहाँ हो तुम ?
बाहर गर्मी है बहुत
और अन्दर सब कुछ सूख रहा है .
अब देर ना करो ज़िन्दगी ! आओ ज़ल्दी.



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